फुरसत के दिन

रामदरश मिश्र की काव्य रचनाएँ

Author

रामदरश मिश्र

Year of Issue

2000

Publication Name

इंद्रप्रस्थ प्रकाशन

Link

View Link

फुरसत के दिन

Description

फुरसत के दिन रामदरश मिश्र की आत्मकथा का पांचवां खण्ड है। उनकी आत्मकथा के चार खण्ड 'जहां मैं खड़ा हूं', 'रोशनी की पगडंडियां', 'टूटते बनते दिन' तथा 'उत्तर पथ' अलग-अलग पुस्तकों के रूप में आ चुके हैं और उन चारों का समवेत रूप भी 'सहचर है समय' नाम से प्रकाशित हो चुका है। फुरसत के दिन में 1990 के बाद के दिनों की यात्रा है जब मिश्र जी दिल्ली विश्वविद्यालय की सेवा से मुक्त हो गए थे। मिश्र जी सदा अपने परिवेश के साथ रहे हैं। फुरसत के दिनों में भी वे उसके साथ चलते रहे हैं। मिश्र जी ने जिस परिवेश के साथ अपने आत्मीय सम्बन्धों का निरूपण किया है वह जड़ और निर्जीव वस्तुओं का संयोजन न होकर एक जीवंत गतिशील इकाई है। उसमें प्रकृति और मनुष्य एक-दूसरे से गहरे जुड़े हैं। अपनी आत्मकथा में वे बड़े अंतरंग अनुभव के स्तर पर इस तथ्य का उद्घाटन करते हैं कि व्यक्ति के निर्माण में उसके परिवेश का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। मिश्र जी की आत्मकथा में अनेक पात्रों और वस्तुस्थितियों का चित्रण है किन्तु इन सबके बीच एक आन्तरिक सम्बन्ध-सूत्रता है। रचनाकार की संवेदना और दृष्टि इन्हें एक नयी सार्थकता प्रदान कर देती है। सामान्य सी दीखने वाली घटनाओं, व्यक्ति चरित्रों और उनके कार्यों में जीवन के आन्तरिक रहस्यों, मूल्यों और आदर्शों के संकेत प्राप्त होने लगते हैं। अनेक औपन्यासिक संवेदनाओं को जन्म देने वाली छोटी-बड़ी हकीकतें जो जीवन में एक-दूसरे से अलग और असम्बद्ध दिखाई देती हैं यहां एक कलात्मक अन्विति प्राप्त कर लेती हैं।