रामदरश मिश्र ने वैसे तो कई विधाओं में प्रभावशाली लेखन किया है किन्तु कविता उनकी केंद्रीय विधा है। उसके साथ उन्होंने अपनी सृजन-यात्रा शुरू की और आज तक उसके साथ चल रहे हैं- तन्मय होकर ! उन्होंने गीत भी लिखे, लंबी कविताएँ भी लिखीं, मुक्त छंद और गद्य छंद वाली छोटी और बड़ी कविताएँ भी लिखी, ग़ज़लें भी लिखीं और महत्वपूर्ण बात यह है कि वे सभी प्रकार की कविताओं की मूल प्रकृति का सम्यक् निर्वाह करते रहे और उन्हें एक नई दीप्ति प्रदान करते रहे। रामदरश मिश्र परिवेश और समय के सत्य से गहरे जुड़े अत्यन्त प्रभावशाली कवि हैं। उनकी कविता में अनुभवगत और विचारगत संश्लिष्टता है, वैविध्य है, किन्तु सर्वत्र सहजता है, पारदर्शिता है। वे कृत्रिम वस्तु और भाषा के दबाव में नहीं आते। अपनी मिट्टी से गहरा लगाव उन्हें और उनके रचना-कर्म को नकली वादों के साथ होने से बचाता रहा है। उनके विभिन्न कविता-संग्रहों पर विशिष्ट समीक्षकों और रचनाकारों की समीक्षाएँ आती रही हैं, साथ ही यशस्वी आलोचकों और सर्जकों ने उनके समूचे कवि-कर्म पर लंबे-लंबे लेख लिखे हैं। इस पुस्तक में उनमें से कुछ चुने हुए लेखों और समीक्षाओं को संकलित किया गया है। निश्चय ही यह पुस्तक मिश्रजी की काव्य-यात्रा की सम्यक् पहचान कराने में समर्थ होगी।