एक वसंत दिग दिगंत

रामदरश मिश्र की काव्य रचनाएँ

मिश्र जी का लेखन बहुविध होने के उपरांत भी पाठकों को बोझिल नहीं करता उन्हें आनंदित करता है|

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पांडेय शशिभूषण 'शितांशु '

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एक वसंत दिग दिगंत

Description

यह पुस्तक पहली बार जीवन - जगत् का तादात्म्य करने-कराने वाली रामदरश जी की उस भावानुप्रवेशी क्षमता का रेखांकन करती है, जो द्रष्टा और स्रष्टा के बीच एक आनुभविक अर्थ-लय की एकतानता बनाती और सर्जना करती है। इसी कारण उनके बहुविधाई साहित्य के साथ पाठकों का साधारणीकरण हो पाता है।

यह पुस्तक बताती है कि रामदरश जी तथाकथित विश्वदृष्टि से मोहाविष्ट नहीं हैं, न उसके अनुयायी और न पैरोकार ही हैं। वह साहित्यकार की निजता और मौलिकता को श्रेय देते हैं। उनकी यह निजी दृष्टि-संदृष्टि से ही घटनाओं, वृत्तान्तों, पात्र-शीलों, कथानकों और भावबन्धों में निहितार्थों का विन्यास हो पाता है।

यह पुस्तक मानती है कि रामदरश जी और उनके साहित्य पर दर्जनों रची गयी कृतियों का एक प्रभापूर्ण तारामंडल विद्यमान है। पर इसके बीच में इस पुस्तक की स्थिति शुक्रतारा की है, जो सन्ध्या में सबसे पहले उदित होता और प्रभातकाल में सारे सितारों के अस्त होने पर भी बना रहता है। इसीलिए रामदरश जी पर लिखी अन्य पुस्तकों को पढ़े बिना और उन सभी पूर्वलिखित पुस्तकों को पढ़ जाने के बाद भी यह पाठकों के लिए एक अवश्य पठनीय पुस्तक बन जाती है, क्योंकि यह सबसे विलग और अपने विवेचन में विशिष्ट है।

विश्वास कीजिए, यह पुस्तक आपको चक्षुराग, श्रवण-राग और मनोराग से साधेगी तथा साहित्य- विवेक की सिद्धि के साथ आपको रामदरश जी के साहित्य के प्रति अनुराग से बाँधेगी।