डॉ. रामदरश मिश्र अत्यंत संवेदनशील व्यक्ति हैं। उन्होंने गाँव से लेकर शहरों तक स्त्रियों और दलितों के साथ होने वाले अमानवीय व्यवहारों को देखा है और दर्द अनुभव करते रहे हैं। उनके उपन्यासों, कहानियों, कविताओं तथा अन्य विधा की रचनाओं में यह दर्द देखा जा सकता है। मिश्र जी नारी- जीवन की महत्ता का बहुत सम्मान करते हैं। जब वे देखते हैं कि नारी पुरुष के अत्याचार का शिकार हो रही है तब उनका मन नारी के प्रति दर्द से भर जाता है और अत्याचारी पुरुष- समाज के प्रति उनके मन में धिक्कार और विद्रोह का भाव भर जाता है। मिश्र जी ने इस सत्य की भी प्रतीति कराई है कि कभी-कभी नारी भी नर के लिए समस्या बन जाती है। दो-एक कहानियों में इसकी ओर भी संकेत हैं।