रामदरश मिश्र का कथाकार अनिवार्यतः भारतीय मूलगामी, मूल्य-दृष्टि से जीवन-यर्थाथ, समाज-जीवन और परिवेश को देखता है। इस कारण भारतीय दार्शनिक सौंदर्य-दृष्टि भी उनका साथ कभी नहीं छोड़ती। नग्न-यथार्थ या यथार्थ के नग्न रूप को प्रस्तुत न कर उसे कलात्मक आवरण में ढंककर प्रस्तुत करना अभीष्ट मानती है, यहाँ यथार्थ न तो पूरा ढंका होता है, न पूरा अनावृत्त, बल्कि आधा ढंका, आधा उघड़ा हुआ यथार्थ-रूप पूरी तरह ढंके भी नहीं और दिखाई भी पड़े, ऐसा हो। मिश्र जी की कहानियाँ सूक्ष्म पर्यवेक्षण के साथ ही रागात्मक संस्पर्शो को रेखांकित करती चलती है।
अपने सुदीर्घ लेखकीय जीवन के विविध, व्यापक, सघन अनुभवों और जंन-तंत्रीय व्यवस्था के संवैधानिक, लोकतंत्रीय समाज के जाग्रत नागरिक अधिकारों के प्रसार, दलित चेतना, नारी की अस्मिता के स्वरों की टंकार को रामदरश मिश्र की संग्रहीत कहानियों में देखा जा सकता है।
-बलदेव वंशी