रामदरश मिश्र के उपन्यास
Description
रामदरश मिश्र जी ने वर्तमान व्यवस्था के अमानवीय स्वरूप को हृदयगत संवेदना के साथ अपने उपन्यासों में प्रस्तुत किया है। उनकी सृजनात्मक शक्ति शहरी एवं ग्रामीण, दोनों जीवन की विषमताओं को साथ लेकर चली है। उनकी सृजनात्मक शक्ति की धुरी है- गहरी मानव-संपृक्ति। आधुनिक युग की भौतिकवादी व्यवस्था में मूल्य का सिलसिला जारी है। इस परिस्थिति में यह व्यक्ति मर्मान्तक पीड़ा झेलता है जो परंपरा से या जीवन-मूल्यों से अपने को पृथक् नहीं कर पाता है। डॉ. रामदेव शुक्ल की धारणा है कि-"उपन्यासकार का अपने परिवेश के साथ जुड़ना आन्तरिक और बाह्य दोनों रूप में अर्थात् ज्ञानात्मक और संवेदनात्मक दोनों स्तरों पर अनिवार्य है।.... अपने आसपास की असंख्य वस्तुओं और सूचनाओं के वर्णन मात्र से परिवेश का रचनात्मक उपयोग होना आवश्यक नहीं है। उपन्यास में परिवेश उसी तरह घुला हुआ, रचा-बसा हुआ होता है जैसे दूध में मक्खन या फूल में सुगन्धा उपन्यास में बाहर से दिखाई पड़ जाए तो परिवेश रचनात्मक न रहकर प्रचारात्मक या गैर-रचनात्मक हो जाता है। इसलिए परिवेश का प्रश्न रचनाकार के यर्थाथबोध से अनिवार्यतः जुड़ा हुआ होता है।... सामान्य व्यक्ति अपने जीवन-क्रम में, मौसम, राजनीतिक, नैतिक आधारों और समय की स्थूल सच्चाइयों के प्रति जाने-अनजाने सतर्क रहता है। उसके मन में परिवेश की कोई स्पष्ट अवधारणा नहीं होती, न उसे इस किस्म की कोई जरूरत होती है। वहीं उपन्यासकार का आधार ही परिवेश बोध होता है। रचना का कच्चा उपकरण यह परिवेश के भीतर से ही सहेजता है।" मिश्र जी वर्तमान व्यवस्था के अमानवीय स्वरूप और तजन्य उत्पन्न निराशा, असंतोष और मनुष्य की व्यवस्था-तंत्र में पिसते मनुष्य की व्यवस्था को